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सत मुलेठी
मुलेठी का उपयोग घर घर में आम तोर से ही किया जाता है, जैसे खाँसी- ज़ुकाम गले की विभिन्न प्रकार की तकलीफो में लोग मुलेठी का प्रयोग तरह- तरह से करते है,लेकिन लोग इससे अधिक जानकारी मुलेठी के बारे में नहीं रखते।आयुर्वेद के अनुसार मुलेठी कफ विकारों में, पित्त विकारों में,थकान व कमज़ोरी में, चर्म रोगों में,नपुंसकता व गुप्त रोगों को दुर करने में उत्तम भूमिका निभाती है,पर सधारणतः आम इंसान इस बात की जानकारी नहीं रखते। आइये मुलेठी व सत मुलेठी में क्या अंतर है पहले तो ये समझें। आयुर्वेद स्पष्ट- स्पष्ट शब्दों में हमे यह समझाता है की औषधि को जितना सूक्ष्म कर दिया जाए वह उतनी उपयोगी हो जाती है।
इसी विषयो पर ध्यान देते हुए महर्षि -सुश्रुत, महृषि- चरक आदि महाऋषियों द्धारा कच्ची औषधियों के अपेक्षा सत्वों का प्रयोग अधिक किया जाता था,इसी लिए मुलेठी से अधिक सत्व मुलेठी गुणों में अधिक उपयोगी है। निरंकार हर्ब्स द्धारा निर्मित यह परम् शुद्ध सत मुलेठी उत्तम श्रेणी की मुलेठी द्धारा छांट छांट कर मात्र साफ़ मुलैठी से ही निर्मित किया जाता है। हमारा प्रयास रहता है की धुल -मिट्टी- सड़ी- गली व ख़राब औषधि को सत निर्माण से पहले ही पूरा- पूरा हटा दिया जाए। निरंकार हर्ब्स द्धारा सत मुलेठी में किसी भी प्रकार के केमिकल या प्रेज़रवेटिव का तिल मात्र भी प्रयोग नहीं किया जाता,यह उसी सात्विकता के साथ आज भी तैयार की जाती है जिस प्रकार आयुर्वेद के प्रख्याण्ड ऋषि गन पुरातन काल में तैयार किया करते थे, इसी लिए निरंकार सत मुलेठी तेज़ी से व कम मात्रा में ही अपना पूरा पूरा गुण दर्शन करवाती है।
गले के व मुख के रोगो में :- मुख व गले के रोगो में 1ग्राम सत मुलेठी 2 छोटी इलायची ,2 काली मिर्च व मिश्री की डली के साथ मुँह में रख कर चूसने से सभी प्रकार के मुख रोगों ,गले के रोगो , मुँह के छाले,खराश आदि समाप्त होते चले जाते है व मुख में स्वच्छ रस का निर्माण व मुख का शोधन होता है,सत मुलैठी सभी प्रकार के मुख विकारों में व पित्त विकारों में स्पष्ट रूप से अपने रोगों निवारक प्रभाव को दिखाती है। मुख सम्बन्धी रोगों में खट्टे व ठंडे पदार्थ,पित्त सम्बन्धी रोगों में खट्टे व गरम पदार्थो का सख्त परहेज करना चाहिए,गले के समस्त रोगों में एक ग्राम सत मुलेठी ,2 चम्मच अदरक का रस,एक चम्मच नमक, एक गिलास गरम जल में मिला कर दिन में तीन चार बार गरारे करने से आशातीत लाभ की प्राप्ति होती हैं। इसी प्रकार प्रतिश्याय(नज़ला ,ज़ुकाम ) का जोर अधिक होने पर कुछ जल में 2 चम्मच अजवाइन ,5 ग्राम सत मुलैठी व 2 चम्मच नमक की भांप दिन में दो से तीन दफा लेनी चाहिए। हर प्रकार के प्रतिश्याय में इस भांप से अकथनीय लाभ होता है।
चर्म रोगों में :- चर्म रोगों में नीम के ताज़े पत्ते,थोड़ी मात्रा में हल्दी, 3 चुटकी फिटकरी,2 चम्मच निरंकार त्रिफला व 10 ग्राम सत मुलैठी को जल में उबाल कर काढ़े की तरह खूब अच्छे से तैयार कर लें व रोगों ग्रस्त स्थान को दिन में 3 -4 बार इसी जल के साथ धोने से बहुत अधिक लाभ की प्राप्ति होती है। इसके साथ साथ पूर्ण रोगों की शांति के लिए मजिष्ठादी कवाथ व निम्बादि क्वाथ का सेवन व रामैरो डी.स का औषधि के रूप में नियमित विधि- विधान से प्रयोग करना चाहिए।
गुप्तांग संक्रमण :- गुप्तांगों में संक्रमण आज कल के समय की एक आम बीमारी है। कारण है, आयुर्वेदिक विधि- विधान व साफ़ सफाई की जानकारी का न होना,इस तरह की दिक्क्तों में सत मुलैठी ,त्रिफला, नीम के ताज़े पत्ते,थोड़ी हल्दी,थोड़ी फिटकरी को जल में उबाल छान कर काढ़े की तरह तैयार कर ले व सूक्ष्म वस्त्र के चार तह कर काढ़े को छान ले व संकर्मित गुप्त अंग बार बार इस ख़ास कीटाणुनाशक काढ़े द्वारा धो कर निरंकार हर्बेरो एंटीसेप्टिक क्रीम का उपयोग करें,अधिक समस्या होने पर इसी क्रीम में जात्यादि तेल को मिला कर लगाने से तीव्रता से लाभ होता है,औषधि प्रयोग में रक्त शोधक पदार्थो का प्रयोग जैसे नीम,मजिष्ठादि,निम्बादि , रामैरो,निरंकार त्रिफला का विधि- विधान पूर्वक साथ ही साथ प्रयोग करने से रोग की पूर्ण शांति होती है।
काम शक्ति वर्धन :- 1 ग्राम सत मुलैठी यदि 200 ग्राम *ध्रोक्षण गौ दूध व मिश्री के साथ सुबह-शाम दो समय नित्य लिया जाए तो अत्यधिक काम शक्ति का वर्धन करता है। ध्रोक्षण दूध न मिलने पर उपलब्ध दूध का ही प्रयोग किया जा सकता है,साथ ही साथ रामैरो डी.एस का सेवन करने से काम शक्ति अत्यधिक प्रबल हो जाती है। इस औषधि का पूर्ण वर्णन व लेने का तरीका रामैरो डी.स के विवरण में काम शक्ति वर्धक ब्लॉक को ध्यान से पढ़े।
* ध्रोक्षण दूध:- गौ माता के थन से निकले ताजे उसी समय के दूध कि धार को जिसमे गौ माता के शरीर की गर्मी बनी रहती है, को ध्रोक्षण बोला जाता है।